Showing posts with label ARTICLES IN HINDI. Show all posts
Showing posts with label ARTICLES IN HINDI. Show all posts

ताकतवर लोकायुक्त

उत्तराखंड कैबिनेट ने राज्य में भ्रष्टाचार पर लगाम के लिए ताकतवर लोकायुक्त व्यवस्था के विधेयक के मसौदे को अपनी मंजूरी दे दी। पिछले कुछ महीनों के दौरान अन्ना हजारे और उनकी टीम द्वारा जन लोकपाल बिल को लेकर चलाए गए आंदोलन से तैयार माहौल के बीच अब उत्तराखंड ऐसा पहला राज्य बनने जा रहा है, जहां सशक्त लोकायुक्त जल्द अस्तित्व में होगा। विधानसभा सत्र में सरकार इस विधेयक को प्रस्तुत करेगी। सदन में इसे पारित कराने में सरकार को कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिए लिहाजा अब बस कुछ वक्त की दरकार है जबकि विधानसभा से पारित होकर यह विधेयक राज्यपाल की मंजूरी के लिए पहंुचेगा। अब यह कहने में कोई गुरेज नहीं कि नया साल आरंभ होने से पहले-पहल उत्तराखंड में लोकायुक्त के रूप में एक ताकतवर संस्था भ्रष्ट तंत्र पर लगाम कसने के लिए वजूद में आ जाएगी। महत्वपूर्ण बात यह है कि उत्तराखंड का लोकायूुक्त टीम अन्ना के जन लोकपाल बिल की भावना के अनुरूप तैयार किया गया है। यही नहीं, इसे तैयार करने में टीम अन्ना के जन लोकपाल के अलावा केंद्र के लोकपाल बिल व अन्य महत्वपूर्ण सुझावों को भी ध्यान में रखा गया है। राज्य के लोकायुक्त को ताकतवर और अधिकार संपन्न बनाने के लिए कर्नाटक, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, राजस्थान, बिहार, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश आदि राज्यों के लोकायुक्त अधिनियम का अध्ययन किया गया। देश में लोकपाल एवं लोकायुक्त व्यवस्था को लेकर पिछले लगभग 42 साल में सात विधेयक संसद में पेश किए गए, इनका अध्ययन भी राज्य के प्रस्तावित लोकायुक्त विधेयक को तैयार करने के लिए किया गया। कैबिनेट की बैठक के बाद इस लोकायुक्त विधेयक के जो प्रावधान सामने आए, उनसे साफ है कि राज्य सरकार ने इसे तैयार करने में खासी मेहनत की।

आरटीआइ की धार कुंद करने की तैयारी!

वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी और गृहमंत्री पी चिदंबरम की बेमन और बेमानी सुलह से कांग्रेस और संप्रग को सद्भावना एवं निश्चिंतता का आधार तो बेशक नहीं मिल पाया, लेकिन दोनों के बीच विवाद ने सरकार को सूचना अधिकार अधिनियम में बदलावों की जमीन तैयार करने का एक अवसर अवश्य दे दिया है। सूचना अधिकार कानून से संप्रग सरकार की बैचेनी केंद्रीय मंत्रियों, प्रधानमंत्री और कांग्रेस के प्रवक्ताओं की तरफ से लगातार आ रहे बयानो से साफ जाहिर हो रही है। संप्रग सरकार के सात सालों के कार्यकाल में यह पहली बार है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी सूचना अधिकार कानून में संभावित बदलावों को लेकर सहमत हैं और किसी निर्णय के मूड में भी। हालांकि सरकार ने सूचना अधिकार अधिनियम में किसी संशोधन से इनकार किया है। फिर भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में संप्रग-1 सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि रही है सशक्त सूचना अधिकार अधिनियम लागू करना। नागरिकों के पास सूचना का अधिकार होना सरकार की जवाबदेही और उसके कामकाज में पारदर्शिता को सुनिश्चित करता है। सूचना का अधिकार प्रशासनिक कार्यो में अनियमितताओं, भ्रष्टाचार को उजागर करने की मजबूत संस्कृति का वाहक भी है। सूचना का अधिकार केवल सार्वजनिक जीवन से जुडे़ आर्थिक, प्रशासनिक एवं संवैधानिक तथ्यों को उजागर करने भर का ही औजार नहीं है, बल्कि यह जनप्रतिनिधियों को मिले जनादेश के सही क्रियान्वयन को विनियमित करने की संवैधानिक संकल्पना भी है। भारतीय के संदर्भ में जवाबदेही व पारदर्शिता की यह संकल्पना 12 अक्टूबर 2005 को लागू सूचना अधिकार अधिनियम से ही परिभाषित हो रही है। अपने मौजूदा स्वरूप में यह कानून दुनिया में मौजूद सभी सूचना कानूनों से मजबूत और प्रभावशाली है। 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में गृहमंत्री चिदंबरम और प्रधानमंत्री कार्यालय तक की भूमिका को विवादों में ले आने वाला वित्त मंत्रालय का पत्र इसी सूचना अधिकार अधिनियम के कारण सार्वजनिक हो सका। यह सूचना अधिकार कानून की मजबूती का सबसे बड़ा उदाहरण है कि इसकी शक्ति से देश का प्रधानमंत्री पद भी अछूता नहीं रहा और इस सूचना कानून की सबसे बड़ी चुनौती भी संभवतया यही है। आज देश का सर्वोच्च शक्तिशाली पद भी इस खामोश जनवादी क्रांति के माध्यम से अपने आपको असहज और नियमित प्रशासनिक कामकाज में हस्तक्षेप के रूप में महसूस कर रहा है। यही कारण है कि प्रधानमंत्री ने सूचना आयुक्तों के सम्मेलन में अपने उद्बोधन के दौरान इस कानून के कुछ प्रावधानों को रेखांकित करते हुए सूचना अधिकार अधिनियम के वर्तमान स्वरूप पर नए सिरे से बहस की जरूरत पर बल दिया है। वास्तव में इन परिवर्तनों में सूचना अधिकार अधिनियम को सशक्त करने से ज्यादा नौकरशाही और सर्वोच्च पदों पर असीन राजनेताओं को फजीहत से बचाने की चिंता साफ है। पुराने नौकरशाह होने के नाते प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की सदैव यह धारणा रही है कि मजबूत और निर्बाध काम करने वाली नौकरशाही व्यवस्था ही देश को भलीभांति चला सकती है। यही कारण है कि प्रधानमंत्री हमेशा नौकरशाह व्यवस्था के बडे़ पैरोकार रहे हैं। सूचना अधिकार अधिनियम द्वारा नौकरशाहों के निर्णयों को सार्वजनिक करने पर कई बार चिंता जाहिर कर चुके प्रधानमंत्री की परेशानी चिदंबरम-प्रणब मुखर्जी विवाद ने निर्णायक रूप से बढ़ा दी है। दरअसल, प्रधानमंत्री चाहते हैं कि अंतर मंत्रालय पत्र व्यवहार और सर्वोच्च पदों पर असीन अधिकारियों द्वारा की जाने वाली नोटिंग्स को सूचना अधिकार अधिनियम के दायरे से बाहर कर दिया जाए। कमोबेश उनकी यही मानसिकता निजता बचाने के तर्क के पीछे भी है, जिससे वह उच्च पदासीन अधिकारियों और राजनेताओं से संबंधित व्यक्तिगत जानकारी को अनिवार्य से स्वेच्छिक कर देने का तर्क दे रहे हैं और यह काफी गहन चर्चा और चिंतन के बाद गढ़ा गया तर्क है। हाल में उनके कई मंत्रियों द्वारा स्वेच्छा से सार्वजनिक किया गया संपत्ति का ब्योरा भी इसी की एक कड़ी के रूप में देखा जाना चाहिए, लेकिन सवाल यह है कि इस प्रकार के बदलाव क्या इस कानून को मजबूत बना पाएंगे या तुलनात्मक रूप से मजबूत वर्तमान सूचना अधिकार कानून को एक लचर कानूनी औपचारिकता में बदलकर रख देंगे? दरअसल, सरकार द्वारा लगातार सूचना कानून पर नए सिरे से बहस की जरूरत पर बल देते रहना और रह-रहकर संशोधन की इच्छा को जाहिर करते रहना कांग्रेस और संप्रग की सूचना कानून से पैदा परेशानियों को ही रेखांकित करता है। अब सवाल यह है कि इस कानून में संशोधन क्या कानून को अधिक सशक्त और पारदर्शी बनाने के लिए है या इसकी धार को कुंद करने के लिए है? सरकार के अलावा मुख्य सूचना आयुक्त ने भी सूचना आयोग को वित्तीय मामलों में स्वायत्तता देने और आयोग को चुनाव आयोग की तरह का संवैधानिक दर्जा देने की मांग करके सूचना अधिकार कानून में बदलाव की मांग में एक नया कोण दे दिया है। सूचना आयुक्त की दिक्कत यह है कि उन्हें अपने सभी छोटे-बडे़ खर्चो के लिए सरकार पर आश्रित रहना पड़ता है और इसे सूचना आयोग को अपने कामकाज में वह स्वायत्तता हसिल नहीं हो पाती है, जो चुनाव आयोग सरीखे संवैधानिक दर्जा प्राप्त संस्थानों के पास है। इसके अलावा भी आरटीआइ कार्यकर्ता लगातार सूचना कानून में व्याप्त खामियों और उन्हें दूर करने के प्रावधानों की मांग करते रहे हैं। सूचना अधिकार अधिनियम में सूचना उपलब्ध कराने की समय-सीमा 30 दिन काफी ज्यादा है, वहीं ब्रिटिश स्वतंत्रता कानून में यह समय-सीमा महज 20 दिन ही है। चूंकि नौकरशाही की मंशा विभागीय सूचनाओं को किसी के साथ साझा नहीं करने की रहती है, इसीलिए 30 दिन में भी वह गलत जवाब देकर आवेदक को अपील की एक लंबी प्रक्रिया में उलझाने की कोशिश में रहते हैं। अपील और द्वितीय अपील की इस प्रक्रिया में कभी-कभी एक साल या उससे भी अधिक का समय लग जाता है। फिर जन सूचना अधिकारी के दोषी पाए जाने पर उस पर लगने वाला आर्थिक दंड भी काफी कम है, जिस कारण कई अधिकारी इस कोशिश में भी रहते हैं कि सूचना की अपेक्षा आर्थिक दंड ही दे दिया जाए। सामान्य नागरिक अक्सर इस लंबी प्रक्रिया से थककर सूचना प्राप्ति के अपने अभियान को बीच में ही छोड़ देते हैं। सूचना अधिकार अधिनियम को अधिक सशक्त बनाने के लिए सबसे जरूरी है कि सूचना उपलब्ध कराने की समय-सीमा को कम किया जाए। साथ ही अपील की प्रक्रिया को सरल और कम समय लेने वाला बनाते हुए दंड के प्रावधान को सख्त करते हुए सूचना अधिकारियों के लिए सूचना उपलब्ध कराने की बाध्यता भी निर्धारित की जाए। इसके अलावा सूचना आवेदक की सुरक्षा का सवाल और प्राप्त सूचना से सामने आने वाली अनियमितताओं और भ्रष्टाचार को दंडित करने की व्यवस्था का आभाव भी इस मजबूत कानून की धार को कमजोर करता है। सूचना अधिकार कानून लोकतंत्र को अधिक पारदर्शी और मजबूत बनाने में अहम भूमिका अदा कर सकता है। बशर्ते सूचना आयोग को संवैधानिक दर्जा देकर इसे स्वायत्त संस्था का रूप दिया जाए और कानून में ऐसे सुधार किए जाएं, जिससे प्रशासनिक निर्णयों की सूचना सुगमता से आम आदमी की पहुंच में हो सके। सूचना अधिकार कानून के माध्यम से सरकार के कामकाज में आने वाली पारदर्शिता को सरकार या उच्चाधिकारियों के काम में हस्तक्षेप नहीं, बल्कि मजबूत होते लोकतंत्र और लोकतंत्र की मजबूती में आम आदमी की भूमिका के रूप में देखा जाना चाहिए।
महेश राठी (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

सूचना क्रांति का आधा-अधूरा अमल

अब उम्मीद की जानी चाहिए कि पिछले दो साल से एक अदद राशन कार्ड पाने के लिए दर दर भटक रही दिल्ली की निवासी एक गरीब बूढ़ी महिला दुर्गा को राशन कार्ड मिल जाएगा? उसे दिल्ली सरकार के दफ्तरों की खाक छानते हुए जो पापड़ बेलने पड़े उन्हें याद करके ही वह सिहर जाती हैं। अंतत: राशन कार्ड की जानकारी पाने के लिए उसे सूचना अधिकार के मार्फत आवेदन दाखिल करना पड़ा। मगर इस हिमाकत के लिए भी उसे सतर्कता समिति के अधिकारी की तरफ से धमकी मिली। इसे गनीमत समझा जाएगा कि दुर्गा को झेलनी पड़ी परेशानी की खबर सूचना आयुक्त के पास पहुंची और उन्हें दुर्गा को मुआवजा देने का निर्देश देना पड़ा। सूचना अधिकार का इस्तेमाल करने वालों को क्या कुछ झेलना पड़ सकता है इसकी महज यह एक बानगी है। बहरहाल, पिछले कुछ दिनों से छत्तीसगढ़ में सक्रिय सूचना अधिकार कार्यकर्ता रमेश अग्रवाल, डॉक्टर हरिहर पटेल आदि का मामला अधिक सूर्खियों में रहा है। रायगढ़ पुलिस द्वारा गिरफ्तार अस्पताल के बेड पर जंजीरों से बंधे पड़े रमेश अग्रवाल की तस्वीर ने काफी आक्रोश पैदा किया था। इन दोनों का जुर्म इतना ही था कि छत्तीसगढ़ के रायगढ जिले के तामनार इलाके में एक अग्रणी कारपोरेट समूह द्वारा जिस कोयला आधारित 300 मेगावाट पावर प्लांट की शुरूआत की जा रही है उसे मिली मंजूरी को लेकर उन्होंने कुछ आवश्यक जानकारी हासिल करनी चाही थी। इस काम के लिए उन्होंने सरकार द्वारा अधिसूचित सूचना अधिकार अधिनियम के प्रावधानों का इस्तेमाल किया था। उन्हें यह देख कर आश्चर्य हुआ कि नवंबर 2010 में प्रस्तुत परियोजना को पर्यावरण संबन्धी मामलों में क्लीयरेंस के बिना ही पर्यावरण मंत्रालय द्वारा मंजूरी दी गई है। गौरतलब था कि पुणे के पास स्थित लवासा प्रोजेक्ट पर पर्यावरण संबंधी मामलों में क्लीयरेंस न लेने के लिए आपत्ति दर्ज कराने वाला पर्यावरण मंत्रालय इस परियोजना पर दोहर मापदंड अपना रहा था। कहा जाता है कि रमेश अग्रवाल, डॉ. हरिहर पटेल आदि की सक्रियताओं से चिढ़े कंपनी के प्रबंधन के इशारे पर इन लोगों की गिरफ्तारियां हुई। आरोप यह लगाया गया कि कंपनी द्वारा आयोजित जन सुनवाई के दौरान उन्होंने कंपनी के कर्मचारियों के साथ दु‌र्व्यवहार किया। उधर पोरबंदर में सूचना अधिकार कार्यकर्ता एवं पेशे से वकील भागु देवानी को इलाके में चल रहे अवैध निर्माणों की जानकारी लेने के लिए सूचना अधिकार का इस्तेमाल करने के लिए जानलेवा हमले का शिकार होना पड़ा। जून माह के अंतिम सप्ताह में जब जनाब भागु देवानी अदालत जा रहे थे, तब दो अनजान व्यक्तियों ने उनकी कार को रोककर उन्हें चाकू से घायल किया। भागु देवानी के मुताबिक यह अवैध निर्माण एक नेता के संरक्षण में हो रहा है, जो शहर के खदान एवं निर्माण उद्योग का उभरता नाम है। गनीमत समझी जाएगी कि भागु देवानी बच गए, मगर गुजरात के ही अमित जेठवा और विश्राम लक्ष्मण दोदिया उतने भाग्यशाली नहीं थे। सूरत के निवासी किताब के व्यापारी दोदिया को टारेंट पॉवर द्वारा लगाए गए अवैध बिजली कनेक्शन की जानकारी सूचना अधिकार के तहत मांगना जहां महंगा पड़ा तो सौराष्ट्र के गिर के संरक्षित जंगलों में जारी अवैध खनन का विरोध करने पर गुजरात हाईकोर्ट के बाहर जेठवा को इलाके के सांसद ने मार डाला। स्पष्ट है कि वर्ष 2005 में पारित सूचना अधिकार कानून के तहत देश के अलग-अलग हिस्सों में आम लोगों द्वारा किए जा रहे इसके प्रयोग एवं सत्ता व संपत्ति पर अपना एकाधिकार समझने वाले कॉरपोरेट मुखियाओं, बेलगाम नौकरशाहों या उन्मत्त राजनेताओं द्वारा इसके खिलाफ की जा रही हिंसक प्रतिक्रिया की मिसालें अक्सर दिखाई देती हैं। वैसे घटनाओं की इस आपाधापी में यह प्रश्न पूछा जाना जरूरी लगता है कि संविधान की धारा 19 जो हमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्राता का अधिकार प्रदान करती है उससे नि:सृत इस कानून की इस संक्षिप्त यात्रा को कैसे देखा जाए? अगर हम फिलहाल गहराई में न भी जाएं तो स्पष्ट है कि इस कानून ने आम लोगों के हाथ में एक ऐसा औजार प्रदान किया है कि वे अपने आप को अधिक सशक्त महसूस कर रहे हैं एवं अपने आप को शासन-प्रशासन की विसंगतियों को उजागर करने की स्थिति में पा रहे हैं। दरअसल, सरकारी ढांचे का स्वरूप इतना अपारदर्शी रहा है कि ब्लॉक स्तर के अदने कर्मचारी या अधिकारी को आप यह सूचना देने के लिए बाध्य नहीं कर सकते थे कि वह बताए कि फलां पुलिया बनाने में कितने धन का आवंटन हुआ और कितना खर्च हुआ। इसके अलावा सूचना के अधिकार का इस्तेमाल कर समूचे देश में छोटे-बडे़ भ्रष्टाचार को उजागर किया जा सका है। कई लोगों पर कार्रवाई भी हुई है। देखा जा सकता है कि प्रस्तुत कानून की मूल भावना यही है कि जब तक हमें यह पता न हो कि सरकारें या सार्वजनिक संस्थान कैसे संचालित होते हैं, हम उसके बारे में कोई सूचनाप्रद राय नहीं रख सकते हैं। दूसरी तरफ इस कानून के बनने के समय से ही इसकी सीमाएं स्पष्ट रही हैं। यह कानून मांगे जाने पर सूचना प्रदान करता है मगर लोगों के जीवन यापन से जरूरी भोजन, पानी, पर्यावरण से जुड़ी जानकारियां अपनी तरफ से देने में कोई रुचि नहीं रखता। निरक्षरों एवं व्यापक गरीबी के इस मुल्क में जानने के हक को यह लोगों को सुगम करने के लिए उन्हें शिक्षित करने के बारे में या सरकारी दायरों में खुलेपन की संस्कृति विकसित करने पर जोर नहीं देता। निजी क्षेत्र को इसके दायरे से पूरी तरह बाहर रखने वाला अधिनियम सरकारी अधिकारियों के हाथों में संकेद्रित सत्ता को भी उजागर करता है। इसके तहत जहां वह सुरक्षा एवं अन्य बहानों के जरिए सूचना देने से मना कर सकते हैं, वहीं तमाम सरकारी महकमों को-सुरक्षा, विदेश नीति की सूचना को प्रतिबंधित रखा गया है। सूचना के अधिकार कानून को कमजोर करने की कोशिशें शुरू हो चुकी हैं। संप्रग हुकूमत में साफ-सुथरी छवि वाले मंत्री एके एंटनी भले ही यह दावा करें कि देश पारदर्शिता क्रांति से गुजर रहा है और हमारी संस्थाएं इसके लिए पूरी तरह तैयार नहीं हैं, मगर हकीकत यही है कि खुद सरकार को ही इस कानून से असुविधा मालूम हो रही है। पिछले दिनों सीबीआइ तथा अन्य जांच एजेंसियों को इसके दायरे के बाहर रखने का मसला भी सामने आया है। सरकार ने अब यह संशोधन भी किया है कि सूचना मांगने वाले की मौत के बाद सूचना अधिकारी जानकारी देने की कार्रवाई को रोक देगा। केंद्र सरकार यह भी चाहती है कि सूचना चाहने के लिए अपील करने वालों को बीच में ही अपील वापस लेने का अधिकार मिले। यह दोनों ही प्रावधान सूचना पाने वाले का मनोबल तोड़ने की कोशिश करने वाले दिखते हैं ताकि सूचना के उजागर होने से जिन व्यक्तियों या समूहों को नुकसान पहुंच रहा हो, वह सूचना पाने वाले पर दबाव डाल सकें या किसी तरह से उन्हें अपने रास्ते से हटा दें।